Bhagavad Gita - ‘हरिगीता’
अभयदान - Assurance of Protection
I am going to continue posting regarding उत्थान पथ (Path to a Spiritual High). The daily prayer, that I posted previously, consisted of shlokas from chapter 11 of the Bhagvadgita. Arjuna regarded Shri Krishna as a dear friend and guide. However, after विश्वरूप दर्शन (Vision of the Cosmic Form) when he experienced the divine majesty of [...]
श्री हरि गीता - अध्याय १२ - भक्ति योग
.. बारहवां अध्याय ..
अर्जुन ने कहा –
अव्यक्त को भजते कि जो धरते तुम्हारा ध्यान हैं .
इन योगियों में योगवेत्ता कौन श्रेष्ठ महान हैं .. १२ . १ ..
श्रीभगवान् ने कहा –
कहता उन्हें मैं श्रेष्ठ मुझमें चित्त जो धरते सदा .
जो युक्त हो श्रद्धा-सहित मेरा भजन करते सदा .. १२ . २ ..
अव्यक्त, अक्षर, अनिर्देश्य, अचिन्त्य [...]श्री हरि गीता - अध्याय ६ - ध्यान योग
छठा अध्याय ..
श्रीभगवान् ने कहा –
फल-आश तज, कर्तव्य कर्म सदैव जो करता, वही .
योगी व संन्यासी, न जो बिन अग्नि या बिन कर्म ही .. ६. १..
वह योग ही समझो जिसे संन्यास कहते हैं सभी .
संकल्प के संन्यास बिन बनता नहीं योगी कभी .. ६. २..
जो योग-साधन चाहता मुनि, हेतु उसका कर्म है .
हो योग [...]Shri Hari Gita 6
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.. छठा अध्याय ..
श्रीभगवान् ने कहा –
फल-आश तज,कर्तव्य कर्म सदैव जो करता,वही .
योगी व संन्यासी,न जो बिन अग्नि या बिन कर्म ही .. [...]गीता महिमा
.. गीता महिमा ..
Gita Mahima MP3
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् .
देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ..
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् .
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ..
गीता हृदय भगवान का सब ज्ञान का शुभ सार है .
इस शुद्ध गीता ज्ञान से ही चल रहा संसार है .. १..
गीता परमविद्या सनातन कर्म शास्त्र प्रधान है .
परब्रह्मरूपी मोक्षकारी नित्य गीता-ज्ञान [...]