Shri Hari Gita 6

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.. छठा अध्याय ..

श्रीभगवान् ने कहा –

फल-आश तज,कर्तव्य कर्म सदैव जो करता,वही .
योगी व संन्यासी,न जो बिन अग्नि या बिन कर्म ही .. ६. १..

वह योग ही समझो जिसे संन्यास कहते हैं सभी .
संकल्प के संन्यास बिन बनता नहीं योगी कभी .. ६. २..

जो योग-साधन चाहता मुनि,हेतु उसका कर्म है .
हो योग में आरूढ़,उसका हेतु उपशम धर्म है .. ६. ३..

जब दूर विषयों से,न हो आसक्त कर्मों में कभी .
संकल्प त्यागे सर्व,योगारूढ़ कहलाता तभी .. ६. ४..

उद्धार अपना आप कर,निज को न गिरने दे कभी .
वह आप ही है शत्रु अपना,आप ही है मित्र भी .. ६. ५..

जो जीत लेता आपको वह बन्धु अपना आप ही .
जाना न अपने को स्वयं रिपु सी करे रिपुता वही .. ६. ६..

अति शान्त जन,मनजीत का आत्मा सदैव समान है .
सुख-दुःख,शीतल-ऊष्ण अथवा मान या अपमान है .. ६. ७..

कूटस्थ इन्द्रियजीत जिसमें ज्ञान है विज्ञान है .
वह युक्त जिसको स्वर्ण,पत्थर,धूल एक समान है .. ६. ८..

वैरी,सुहृद,मध्यस्थ,साधु,असाधु,जिनसे द्वेष है .
बान्धव,उदासी,मित्र में सम बुद्धि पुरुष विशेष है .. ६. ९..

चित-आत्म-संयम नित्य एकाकी करे एकान्त में .
तज आश-संग्रह नित निरन्तर योग में योगी रमें .. ६. १०..

आसन धरे शुचि-भूमि पर थिर,ऊँच नीच न ठौर हो .
कुश पर बिछा मृगछाल,उस पर वस्त्र पावन और हो .. ६. ११..

एकाग्र कर मन,रोक इन्द्रिय चित्त के व्यापार को .
फिर आत्म-शोधन हेतु बैठे नित्य योगाचार को .. ६. १२..

होकर अचल,दृढ़,शीश ग्रीवा और काया सम करे .
दिशि अन्य अवलोके नहीं नासाग्र पर ही दृग धरे .. ६. १३..

बन ब्रह्मचारी शान्त,मन-संयम करे भय-मुक्त हो .
हो मत्परायण चित्त मुझमें ही लगाकर युक्त हो .. ६. १४..

यों जो नियत-चित युक्त योगाभ्यास में रत नित्य ही .
मुझमें टिकी निर्वाण परमा शांति पाता है वही .. ६. १५..

यह योग अति खाकर न सधता है न अति उपवास से .
सधता न अतिशय नींद अथवा जागरण के त्रास से .. ६. १६..

जब युक्त सोना जागना आहार और विहार हों .
हो दुःखहारी योग जब परिमित सभी व्यवहार हों .. ६. १७..

संयत हुआ चित आत्म ही में नित्य रम रहता जभी .
रहती न कोई कामना नर युक्त कहलाता तभी .. ६. १८..

अविचल रहे बिन वायु दीपक-ज्योति जैसे नित्य ही .
है चित्तसंयत योग-साधक युक्त की उपमा वही .. ६. १९..

रमता जहाँ चित योग-सेवन से निरुद्ध सदैव है .
जब देख अपने आपको संतुष्ट आत्मा में रहे .. ६. २०..

इन्द्रिय-अगोचर बुद्धि-गम्य अनन्त सुख अनुभव करे .
जिसमें रमा योगी न डिगता तत्त्व से तिल भर परे .. ६. २१..

पाकर जिसे जग में न उत्तम लाभ दिखता है कहीं .
जिसमें जमे जन को कठिन दुख भी डिगा पाता नहीं .. ६. २२..

कहते उसे ही योग जिसमें सर्वदुःख वियोग है .
दृढ़-चित्त होकर साधने के योग्य ही यह योग है .. ६. २३..

संकल्प से उत्पन्न सारी कामनाएँ छोड़के .
मनसे सदा सब ओर से ही इन्द्रियों को मोड़के .. ६. २४..

हो शान्त क्रमशः धीर मति से आत्म-सुस्थिर मन करे .
कोई विषय का फिर न किंचित् चित्त में चिन्तन करे .. ६. २५..

यह मन चपल अस्थिर जहाँ से भाग कर जाये परे .
रोके वहीं से और फिर आधीन आत्मा के करे .. ६. २६..

जो ब्रह्मभूत,प्रशान्त-मन,जन रज-रहित निष्पाप है .
उस कर्मयोगी को परम सुख प्राप्त होता आप है .. ६. २७..

निष्पाप हो इस भाँति जो करता निरन्तर योग है .
वह ब्रह्म-प्राप्ति-स्वरूप-सुख करता सदा उपभोग है .. ६. २८..

युक्तात्म समदर्शी पुरुष सर्वत्र ही देखे सदा .
मैं प्राणियों में और प्राणीमात्र मुझमें सर्वदा .. ६. २९..

जो देखता मुझमें सभी को और मुझको सब कहीं .
मैं दूर उस नर से नहीं वह दूर मुझसे है नहीं .. ६. ३०..

एकत्व-मति से जान जीवों में मुझे नर नित्य ही .
भजता रहे जो,सर्वथा कर कर्म मुझमें है वही .. ६. ३१..

सुख-दुःख अपना और औरों का समस्त समान है .
जो जानता अर्जुन!वही योगी सदैव प्रधान है .. ६. ३२..

अर्जुन ने कहा –

जो साम्य-मति से प्राप्य तुमने योग मधुसूदन!कहा .
मन की चपलता से महा अस्थिर मुझे वह दिख रहा .. ६. ३३..

हे कृष्ण! मन चञ्चल हठी बलवान् है दृढ़ है घना .
मन साधना दुष्कर दिखे जैसे हवा का बाँधना .. ६. ३४..

श्री भगवान् ने कहा –

चंचल असंशय मन महाबाहो!कठिन साधन घना .
अभ्यास और विराग से पर पार्थ!होती साधना .. ६. ३५..

जीता न जो मन,योग है दुष्प्राप्य मत मेरा यही .
मन जीत कर जो यत्न करता प्राप्त करता है वही .. ६. ३६..

अर्जुन ने कहा –

जो योग-विचलित यत्नहीन परन्तु श्रद्धावान् हो .
वह योग-सिद्धि न प्राप्त कर,गति कौन सी पाता कहो?६. ३७..

मोहित निराश्रय,ब्रह्म-पथ में हो उभय पथ-भ्रष्ट क्या .
वह बादलों-सा छिन्न हो,होता सदैव विनष्ट क्या ?६. ३८..

हे कृष्ण!करुणा कर सकल सन्देह मेरा मेटिये .
तज कर तुम्हें है कौन यह भ्रम दूर करने के लिये ?६. ३९..

श्रीभगवान् ने कहा –

इस लोक में परलोक में वह नष्ट होता है नहीं .
कल्याणकारी-कर्म करने में नहीं दुर्गति कहीं .. ६. ४०..

शुभ लोक पाकर पुण्यवानों का,रहे वर्षों वहीं .
फिर योग-विचलित जन्मता श्रीमान् शुचि के घर कहीं .. ६. ४१..

या जन्म लेता श्रेष्ठ ज्ञानी योगियों के वंश में .
दुर्लभ सदा संसार में है जन्म ऐसे अंश में .. ६. ४२..

पाता वहाँ फिर पूर्व-मति-संयोग वह नर-रत्न है .
उस बुद्धि से फिर सिद्धि के करता सदैव प्रयत्न है .. ६. ४३..

हे पार्थ! पूर्वाभ्यास से खिंचता उधर लाचार हो .
हो योग-इच्छुक वेद-वर्णित कर्म-फल से पार हो .. ६. ४४..

अति यत्न से वह योगसेवी सर्वपाप-विहीन हो .
बहु जन्म पीछे सिद्ध होकर परम गति में लीन हो .. ६. ४५..

सारे तपस्वी. ज्ञानियों से,कर्मनिष्ठों से सदा .
है श्रेष्ठ योगी,पार्थ!हो इस हेतु योगी सर्वदा .. ६. ४६..

सब योगियों में मानता मैं युक्ततम योगी वही .
श्रद्धा-सहित मम ध्यान धर भजता मुझे जो नित्य ही .. ६. ४७..

छठा अध्याय समाप्त हुआ .. ६..

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः .. ६..


अथ षष्ठोऽध्यायः . आत्मसंयमयोगः

श्रीभगवानुवाच .

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः .
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः .. ६-१..

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव .
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन .. ६-२..

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते .
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते .. ६-३..

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते .
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते .. ६-४..

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् .
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः .. ६-५..

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः .
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् .. ६-६..

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः .
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः .. ६-७..

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः .
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः .. ६-८..

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु .
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते .. ६-९..

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः .
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः .. ६-१०..

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः .
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् .. ६-११..

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः .
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये .. ६-१२..

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः .
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् .. ६-१३..

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः .
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः .. ६-१४..

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः .
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति .. ६-१५..

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः .
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन .. ६-१६..

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु .
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा .. ६-१७..

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते .
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा .. ६-१८..

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता .
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः .. ६-१९..

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया .
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति .. ६-२०..

सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् .
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः .. ६-२१..

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः .
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते .. ६-२२..

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् .
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा .. ६-२३..

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः .
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः .. ६-२४..

शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया .
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् .. ६-२५..

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् .
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् .. ६-२६..

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् .
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् .. ६-२७..

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः .
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते .. ६-२८..

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि .
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः .. ६-२९..

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति .
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति .. ६-३०..

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः .
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते .. ६-३१..

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन .
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः .. ६-३२..

अर्जुन उवाच .

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन .
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् .. ६-३३..

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् .
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् .. ६-३४..

श्रीभगवानुवाच .

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् .
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते .. ६-३५..

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः .
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः .. ६-३६..

अर्जुन उवाच .

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः .
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति .. ६-३७..

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति .
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि .. ६-३८..

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः .
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते .. ६-३९..

श्रीभगवानुवाच .

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते .
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति .. ६-४०..

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः .
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते .. ६-४१..

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् .
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् .. ६-४२..

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् .
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन .. ६-४३..

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः .
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते .. ६-४४..

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः .
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् .. ६-४५..

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः .
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन .. ६-४६..

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना .
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः .. ६-४७..

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु
ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः .. ६..


This is taken from Shri Hari Gita, by Pandit Deena Nath Bhargava “Dinesh.” The uniqueness of the book is that it is in poetry, with one Hindi verse for each Sanskrit shloka.

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